जब अश्वमेध महायज्ञ जैसे विराट यज्ञ नहीं होते, तब समाज में धर्मबोध का ह्रास होने लगता है।
यज्ञ परंपरा के अभाव में वेदों की शिक्षाएँ केवल ग्रंथों तक सीमित रह जाती हैं, जीवन में उनका प्रयोग नहीं हो पाता।
अश्वमेध महायज्ञ न होने से सामूहिक चेतना और एकता कमजोर पड़ जाती है।
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ऐसे यज्ञों के बिना समाज में नैतिक मूल्यों का पतन तेजी से बढ़ता है।
जब राजकीय या सार्वजनिक स्तर पर यज्ञ नहीं होते, तब शासन और प्रजा के बीच धर्मसम्मत संबंध टूटने लगते हैं।
यज्ञ न होने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार रुक जाता है, जिससे मानसिक अशांति बढ़ती है।
अश्वमेध महायज्ञ के अभाव में विश्वशांति और लोककल्याण की भावना कमजोर पड़ जाती है।
ऐसे महायज्ञ न होने पर त्याग, संयम और तपस्या जैसे गुण समाज से लुप्त होने लगते हैं।
यज्ञ परंपरा के टूटने से आध्यात्मिक जागरण की प्रक्रिया बाधित हो जाती है।
जब अश्वमेध महायज्ञ नहीं होते, तब मानव केवल भौतिक प्रगति तक सीमित हो जाता है और आत्मिक विकास रुक जाता है।


