कोलकाता की पावन भूमि से चलकर आए, पूर्व जन्म के महान तपस्वी सदगुरु जी महाराज के कृपा पात्र बालाचार्य ने बैरशवरा नंद ने सदगुरु महाराज के सानिध्य में आज अपने ओजस्वी प्रवचन में रामचरितमानस के एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग—माँ सीता पर प्रहार करने वाले कागभुषुण्डि—के चरित्र पर गूढ़ प्रकाश डाला। उनका प्रवचन केवल कथा नहीं था, बल्कि भक्ति, अहंकार, करुणा और प्रभु-कृपा का जीवंत दर्शन था।
बालाचार्य ने कहा—
“कागभुषुण्डि कोई साधारण पात्र नहीं, वह आत्मा की यात्रा का प्रतीक है। वह हमें बताता है कि भक्ति बिना विनय के अपूर्ण है और अहंकार चाहे जितना सूक्ष्म हो, पतन का कारण बनता है।”
उन्होंने श्रोताओं को उस प्रसंग में ले जाते हुए बताया कि जब माँ सीता वनविहार में थीं और एक काग उनके चरणों के समीप आया, तो उसने अज्ञानवश या कुत्सित भाव से माता पर प्रहार कर दिया। यह घटना बाह्य रूप से छोटी लग सकती है, पर इसके भीतर गहन आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
बालाचार्य ने स्पष्ट किया कि उस काग का यह कृत्य अपराध से अधिक अहंकार का परिणाम था—एक ऐसा अहंकार जो स्वयं को ज्ञानी समझ बैठता है। जैसे ही प्रभु श्रीराम ने उस काग की ओर दृष्टि डाली, उसका तेज सहन न कर पाने पर वह त्राहि-त्राहि करने लगा। समस्त लोकों में भटकने के बाद भी उसे कहीं शरण न मिली। तब उसने माँ सीता के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की।
यहीं बालाचार्य ने प्रवचन का केंद्रीय बिंदु रखा—
“जहाँ न्याय समाप्त होता है, वहीं करुणा आरंभ होती है।”
माँ सीता ने उस काग के लिए श्रीराम से प्रार्थना की। प्रभु ने दंड को समाप्त नहीं किया, बल्कि दया से परिष्कृत किया—काग की एक आँख गई, पर उसका जीवन बचा और उसे भक्ति का वरदान मिला। यही काग आगे चलकर कागभुषुण्डि कहलाया—जो नारदजी जैसे महर्षियों को रामकथा का उपदेश देने वाला महान भक्त बना।
बालाचार्य ने भावुक स्वर में कहा—
“देखिए, जिसने माता पर प्रहार किया, वही करुणा पाकर कथा का अमर वक्ता बन गया। यह रामराज्य की न्याय-व्यवस्था है—जहाँ दंड सुधार के लिए होता है, विनाश के लिए नहीं।”
प्रवचन के अंत में उन्होंने श्रोताओं को आत्ममंथन का आह्वान किया—

